Wednesday, September 5, 2012

मूक अहसास

सुबह का नाश्ता
दिन का खाना
शाम की चखना
या रात की dinner
कुछ भी तो नहीं  खाया था
सब यूँ का यूँ धरा था
 
आवाज़ लगाने पर वो पास तो आई
पर आज उसके चेहरे पर
अजीब से ख़ामोशी थी छाई
 
उसकी ख़ामोशी
हमारा दिल चीर रही थी
पर वो मूक....
कुछ बोल भी तो न पाती थी...
 
खिलोने
खाना
सब थे... उसके सामने
पर रोज़ की तरह भाग के उनकी ओर
न तो वो लपकी
न हमसे कोई छीनाझपटी ही की
 
सिमटी सी उस दिन
मेरी गोद में आके चुप चाप बैठ गयी
ऐसा तो उसने कभी किया न था
जब भी पास बुलाना चाहा
दूर ही भागती थी....
उसके रेशमी बदन को सहलाते हुए
आज कुछ अजीब सा महसूस हुआ...
 कुछ था.....जो वो यूँ चुप थी
 
 
क्रमश

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